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अपराधों को बढ़ाने में सिनेमा की भूमिका अहम


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आजकल के फिल्मों और वेब सीरीजो के माध्यम से जिस तरह का अपराधनुमा कंटेंट का प्रयोग हो रहा है वह अशिष्ट,अमर्यादित,बेलगाम व निरंकुश है। इसे समाज मे अपराधों को बढ़ावा मिल रहा है। कटु यथार्थ के नाम पर जिस तरह का भाषा व शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है वह स्तरहीन है, चिंतनीय है। यह धीमा जहर अनावश्यक ही परोसा जा रहा जो दर्शकों के सबकांशियस माइंड मे बैठ कर बुद्धि को भ्रष्ट कर रहा है। उन्हें असहनशील व असंयमित बना रहा है। जिसे अपराधों को बढ़ावा मिल रहा है। हमारे समाज में अपराधों को बढ़ाने में सिनेमा की भूमिका अहम है। फिल्में बनाते समय उसके दुष्प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा जा रहा। अगर हम सच मे अपराधों पर नियंत्रण करना चाहते है, तो हमे यह सुनिश्चित करना होगा की समाज मे ग़लत चीजों को बढ़ावा ना मिले। कितने भी अच्छे विषय को लेकर मूवी बनाई हो लेकिन लोकप्रियता और भेड़चाल में अभद्रता शामिल करना अनिवार्य क्यों बनता जा रहा है? प्रयोग की जा रही अभद्र भाषा का उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है औऱ न ही फ़िल्मों के नाम लेने की। हालांकि यह वाद विवाद का विषय हो सकता है कि जो समाज में व्याप्त है हम वही दिखाते हैं, "तो क्या घिनौनी वास्तविकता दिखा कर समस्या का समाधान मिल जाएगा" व्यक्ति जो देखता-सुनता है, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसका मानस वैसा ही बनता जाता है। तथाकथित मनोरंजन की सामग्री पीढि़यों से संचित आदर्श को पलभर में ध्वस्त कर देने का सामर्थ्य रखता हैं और साथ ही ये हमारे समाज में पुष्पित संस्कारशील युवा पौधों को समूल नष्ट कर सकने का सामर्थ्य भी रखता है, क्योंकि दृश्य का सीधा संबंध भावों से होता है और यदि उसमें ध्वनि हो तो वह सीधे चेतना को उद्दवेलित करती है। अतःयदि इन मनोरंजन सामग्री के द्वारा परोसी गई भ्रष्ट भाषा, हिंगलिश भाषा या अपशब्दों से भरी भाषा के साथ हमारे बढ़ते हुए बच्चों का परिचय होगा तो वह न केवल उनकी भाषा को बिगाड़ेगा बल्कि उनके अवचेतन को भी दूषित कर सामाजिक अव्यवस्था, अस्वस्थता और अपराधों को जन्म देगा। यह सब तेजी से बढ़ रहा है औऱ आगे शायद इसको और भी गति मिलेगी। यह सुनामी का रूप धारण कर सकता है इससे पहले कि यह आने वाली पीढ़ियों की लत बन जाए, आगे स्थितियां मनोरंजन के नाम पर और विस्फोटक हो जाएं, इन पर लगाम कसनी चाहिए।

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