• Vimal Kumar

पुस्तकें सिर्फ दुख की साथी ही नहीं, क्रांति की उद्घोषक भी हैं - "विश्व पुस्तक दिवस" (23अप्रैल)



आज विश्व पुस्तक दिवस है। पुस्तक प्रेमियों के लिए यह पर्व जैसा है सिर्फ पुस्तक प्रेमियों ही क्यों यह समूचे समाज के लिए पर्व जैसा होना चाहिए। एक प्रबुद्ध समाज के लिए पुस्तकें मानसिक खुराक का साधन हैं। जिस भी समाज में पठनीयता रही है वह ज्यादा परिपक्व रहा है। निर्मल वर्मा कहते हैं, “किताबें मन का शोक, दिल का डर या अभाव की हूक कम नहीं करतीं, सिर्फ सबकी आंख बचाकर चुपके से दुखते सिर के नीचे सिरहाना रख देती हैं।”

पुस्तकें सिर्फ दुख की ही साथी नहीं हैं वे क्रांति की भी उद्घोषक हैं। पुस्तकें सिर्फ राजनीतिक क्रांति ही नहीं करती हैं बल्कि किसी भी समाज के जर्जर ढांचे को गिरा कर नवीन समावेशी इमारत का निर्माण भी करती हैं। संत गाडगे आह्वान करते हैं, “भले ही एक कपड़ा कम पहनों। अगर थाली नहीं है तो हथेली पर रखकर खाओ लेकिन अपने बच्चों को पुस्तके जरूर पढ़ाओ।” बढ़ती उम्र के अंकों को ही ज्ञान समझने वालों को अब्राहम लिंकन आगाह करते हैं और कहते हैं, “किताबें आदमी को ये बताने के काम आती हैं कि उसके मूल विचार आखिरकार इतने नए भी नहीं हैं।”

आज जब ज्ञान संस्कृति के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है और पठनीयता में गिरावट आ रही है तो किसी ने तो यहाँ तक कह दिया, “कागज की ये महक...ये नशा रूठने को है...किताबों से इश्क करने की ये आखिरी सदी है...!” लेकिन सफ़दर हाशमी बहुत ही संवेदनशीलता से किताबों के मन की बात को बयान करते हैं और आपसे अपेक्षा रखते हैं कि आप भी किताबों से बात करेंगे…! “किताबें करती हैं बातें बीते जमानों की दुनिया की, इंसानों की आज की कल की एक-एक पल की। खुशियों की, गमों की फूलों की, बमों की जीत की, हार की प्यार की, मार की। सुनोगे नहीं क्या किताबों की बातें? किताबें, कुछ तो कहना चाहती हैं तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।”



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- विमल कुमार असिस्टेंट प्रोफेसर

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